अन्त्येष्टि: पवित्र साधना से बोझिल प्रक्रिया
जहां कभी अन्त्येष्टि आत्मा की मुक्ति और समाज के सामूहिक प्रार्थना का माध्यम थी, आज यह केवल एक ‘खानापूरी’ है। पंडित को बुलाकर जल्दी-जल्दी मंत्र पढ़वाना, बिना भाव के रस्में निभाना और भोज-दिखावे में अधिक ध्यान देना — यही वास्तविकता है।भूले-बिसरे आश्रम और संस्कार
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास — इन चार आश्रमों का उद्देश्य जीवन को संतुलित करना था। सोलह संस्कार आत्मा को उन्नति की ओर ले जाने वाले पड़ाव थे। आज विवाह संस्कार व्यापार और मृत्यु संस्कार औपचारिकता बन गए हैं। इस स्थिति में हिंदू कहलाना केवल दिखावा है।पाखंड और आडंबर की पराकाष्ठा
- भव्य मंदिर बने, पर घरों की पवित्रता खो दी।
- त्योहारों पर करोड़ों खर्च, पर संस्कार बोझ माने गए।
- “सनातन धर्म” का नारा लगाया, पर जीवन मूल्यों को त्याग दिया।
- देवताओं की मूर्तियों की पूजा की, पर उनके सार का उपहास किया।


















































