क्या हुआ
- आरटीई सत्र 2025–26 की प्रक्रिया 25 मार्च से शुरू हुई; 9 अप्रैल को लॉटरी के जरिए 80,000+ बच्चों का चयन हुआ।
- 9 अप्रैल से अब तक सात महीने से अधिक बीत चुके हैं, पर 44,060 से अधिक बच्चे अब भी स्कूल नहीं जा पाए।
- प्रारंभिक शिक्षा बीकानेर के आदेश में स्वीकार किया गया कि कम से कम 7 निजी स्कूलों ने आरटीई के तहत चयनित निःशुल्क बच्चों को प्रवेश देने से मना किया।
- शासन ने केवल नोटिस/पत्राचार किया; परन्तु संघ का तर्क है कि औपचारिकता से काम नहीं चल सकता — तत्काल मान्यता/एनओसी निलंबन और सख्त कार्रवाई जरूरी है।
अभिभावक संघ की तीखी प्रतिक्रिया और मांगें
प्रदेश प्रवक्ता अभिषेक जैन बिट्टू ने इसे बच्चों के संवैधानिक अधिकारों के साथ खिलवाड़ करार दिया। संघ ने स्पष्ट किया कि यदि विभाग तुरंत कार्रवाई नहीं करता तो वे प्रदेशव्यापी आंदोलन पर जाएंगे। उनकी प्रमुख मांगें हैं:
- आरटीई के तहत प्रवेश से इनकार करने वाले स्कूलों की मान्यता/एनओसी तत्काल निलंबित की जाए।
- सभी प्रभावित बच्चों को तुरन्त प्रवेश दिला कर सार्वजनिक रूप से अनुपालन सुनिश्चित किया जाए।
- शिक्षा विभाग की लापरवाही की उच्च स्तरीय जांच कराकर जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई हो।
- राज्यभर में आरटीई अनुपालन के लिए स्कूल-स्तरीय मासिक रिपोर्टिंग सिस्टम लागू किया जाए।
बच्चों पर असर — पढ़ाई व भविष्य संकट में
सात महीने की देरी का सबसे बड़ा बोझ सीधे बच्चों और उनके परिवारों पर पड़ा है — प्रारंभिक शिक्षा छूटी, संतुलित विकास बाधित और अभिभावक अनिश्चितता के बीच भटक रहे हैं। लंबे समय तक स्कूल नहीं आने से पढ़ाई का गैप बढ़ेगा और कमजोर वर्ग के बच्चों के लिए यह नुकसान स्थायी हो सकता है।
क्या जवाबदेही का तंत्र विफल?
शिक्षा विभाग द्वारा केवल पत्राचार करना प्रश्न खड़ा करता है कि क्या विभाग के पास अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए पर्याप्त ताकत और नीति-क्रिया मौजूद है। यदि मान्यता निलंबन जैसे सख्त उपाय नहीं अपनाए गए तो निजी स्कूलों के लिए नियम पालन केवल कागजी हो कर रह जाएगा।
अगला कदम
संयुक्त अभिभावक संघ ने चेतावनी दी है कि यदि विभाग 7 दिनों के अंदर ठोस कार्रवाई नहीं करता तो वह व्यापक आंदोलन की घोषणा करेगा। वहीं शिक्षा विभाग से भी उम्मीद है कि वह स्पष्ट समयसीमा में रिपोर्ट और अनुपालन-क्रम अपनाकर बच्चों के अधिकार की रक्षा सुनिश्चित करे। इस टकराव की अगली कड़ी आने वाले दिनों में तय होगी — पर बच्चों का भविष्य दांव पर है।
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