बिना हस्ताक्षर के दस्तावेज पास, नियम टूटे—क्या एमबीजीएच टेंडर में ऊपर से संरक्षण मिला?

MBGH Udaipur: उदयपुर। सरकारी अस्पतालों से जब पारदर्शिता और ईमानदारी की उम्मीद की जाती है, उसी वक्त महाराणा भूपाल राजकीय चिकित्सालय (एमबीजीएच) उदयपुर से सामने आई एक आधिकारिक जांच रिपोर्ट ने सिस्टम की जड़ों को हिला कर रख दिया है। टेंडर संख्या 35/02.07.2025 से जुड़ा यह मामला अब केवल तकनीकी त्रुटि नहीं, बल्कि नियमों को ताक पर रखकर किए गए कथित खेल की ओर इशारा कर रहा है। सवाल साफ है (MBGH Udaipur) क्या मरीजों की सेहत से जुड़े टेंडरों में भी ‘मैनेजमेंट’ का खेल चल रहा है?

बिना हस्ताक्षर का ऑथराइजेशन, फिर भी वैध!

जांच रिपोर्ट का सबसे चौंकाने वाला खुलासा यह है कि संबंधित फर्म द्वारा प्रस्तुत किया गया ऑथराइजेशन लेटर बिना हस्ताक्षर का था। हैरानी यहीं खत्म नहीं होती—मूल निर्माता कंपनी ने लिखित रूप में साफ किया है कि उसने ऐसा कोई ऑथराइजेशन जारी ही नहीं किया।

इसके बावजूद दस्तावेज़ को टेंडर प्रक्रिया में मान्य मान लिया गया। अब सवाल उठता है कि बिना हस्ताक्षर और बिना वैधता के कागजात किसके इशारे पर स्वीकार किए गए?

शपथ पत्र और स्टाम्प में भी नियमों से खिलवाड़

टेंडर शर्तों के अनुसार, निविदादाता को नॉन-ज्यूडिशियल स्टाम्प पर शपथ पत्र देना अनिवार्य था। लेकिन जांच रिपोर्ट बताती है कि जो स्टाम्प प्रस्तुत किया गया, वह निविदा तिथि से पहले ही प्रमाणित था।

यह सीधे तौर पर शर्तों का उल्लंघन है। ऐसे में यह सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या यह महज़ लापरवाही थी या फिर जानबूझकर दी गई छूट?

पांच की जगह छह कंपनियों के मेक, फिर भी मंजूरी

टेंडर की शर्त संख्या 46 स्पष्ट कहती है कि एक आइटम के लिए अधिकतम पांच कंपनियों के मेक ही स्वीकार किए जाएंगे। लेकिन संबंधित फर्म ने छह कंपनियों के मेक दर्शाए।

जांच रिपोर्ट के अनुसार, यह स्थिति सीधे तौर पर निविदा निरस्तीकरण की श्रेणी में आती है। इसके बावजूद न तो टेंडर रद्द हुआ और न ही फर्म के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई दिखाई दी।

आइटम यूनिट में हेरफेर, तकनीकी मूल्यांकन संदेह के घेरे में

रिपोर्ट में यह भी दर्ज है कि कुछ आइटम्स में यूनिट बदलकर या काट-छांट कर मेक दिखाए गए, जो टेंडर शर्तों के खिलाफ है।

इस पूरे मामले में तकनीकी मूल्यांकन समिति और अस्पताल प्रशासन की चुप्पी कई सवाल खड़े कर रही है। अगर सब कुछ नियमों के मुताबिक था, तो रिपोर्ट में बार-बार उल्लंघन का जिक्र क्यों?

अधीक्षक की भूमिका पर उठे सवाल

इतनी गंभीर अनियमितताओं के बावजूद संबंधित फर्म के खिलाफ त्वरित और निर्णायक कार्रवाई न होना, एमबीजीएच अधीक्षक आर.एल. सुमन की भूमिका को संदेह के घेरे में ला रहा है।

आरोप है कि नियमों की अनदेखी कर फर्म को संरक्षण दिया गया। यदि ऐसा नहीं है, तो फिर कार्रवाई में देरी किस वजह से?

जवाबदेही या फाइलों में दफन?

राजस्थान ट्रांसपेरेंसी इन पब्लिक प्रोक्योरमेंट (RTPP) एक्ट 2012 और नियम 2013 ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई का प्रावधान करते हैं। इसके बावजूद अब तक कोई ठोस कदम न उठाया जाना सरकारी खरीद प्रणाली की पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।

अब सबसे बड़ा सवाल यही है…क्या इस पूरे प्रकरण की स्वतंत्र और उच्चस्तरीय जांच होगी, या फिर यह मामला भी बाकी विवादों की तरह फाइलों में दफन कर दिया जाएगा?

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Bodh Saurabh Web Team

Bodh Saurabh is an experienced Indian journalist and digital media professional, with over 14 years in the news industry. He currently works as the Assistant News Editor at Bodh Saurabh Digital, a platform known for providing breaking news and videos across a range of topics, including national, regional, and sports coverage.

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