क्या नया है?
DRDO द्वारा विकसित अग्नि-5 एक तीन-चरणीय, ठोस-ईंधन चालित बैलिस्टिक मिसाइल है। इसकी मारक दूरी 5,000 किलोमीटर से अधिक बताई जा रही है, जिसे तकनीकी रूप से 8,000 किलोमीटर तक विस्तारित किये जाने की संभावना भी जताई जाती है। मिसाइल लगभग 17 मीटर लंबी और 2 मीटर व्यास की है तथा इसका वजन लगभग 50 टन है। सड़क-सक्षम मोबाइल लॉन्चर से यह तैनात और पुनर्स्थापित की जा सकती है।
सबसे महत्वपूर्ण तकनीकी उन्नयन: अग्नि-5 पर एमआईआरवी प्रणाली का सफल प्रदर्शन — अर्थात् एक ही बूस्टर से कई स्वतंत्र लक्ष्यों पर वारहेड भेजने की क्षमता। यह भारत को उन कुछ देशों में शामिल करता है जिनके पास यह उन्नत क्षमता है।
तकनीकी विशेषताएँ — संक्षेप में
- तीन-चरणीय ठोस-ईंधन प्रणालियाँ
- लंबाई ~17 मीटर, व्यास ~2 मीटर, वजन ~50 टन
- मोबाइल-लॉन्चर तैनाती की क्षमता (road-mobile)
- एमआईआरवी (Multiple Independently Targetable Reentry Vehicles) समर्थन
- परख के दौरान रीयल-टाइम ट्रैकिंग और एडवांस रडार निगरानी द्वारा पूर्ण मूल्यांकन
क्या बदलेगा?
अग्नि-5 के परीक्षण से भारत की रक्षा नीति पर कई आयामों में बदलाव आने की संभावना है:
- प्रत्यास्थता की मजबूती: न्यूनतम प्रत्यास्थता के सिद्धांत के अंतर्गत भारत अब और सुस्पष्ट, विविध और विश्वसनीय प्रतिशोध-क्षमता रखता है।
- क्षेत्रीय संतुलन: एशिया, यूरोप और अफ्रीका के बड़े हिस्से तक पहुंच से क्षेत्रीय रणनीतिक समीकरणों में परिमाणगत बदलाव संभव है….विशेषकर मिसाइल-रेंज और शस्त्र-नियोजन के संदर्भ में।
- कमांड-एंड-कंट्रोल और सुरक्षा: एमआईआरवी-सक्षम सिस्टम की तैनाती के साथ युद्ध-नियंत्रण, भरोसेमंद कम्यूनिकेशन और संयम को सुनिश्चित करने वाली प्रक्रियाएँ और भी महत्वपूर्ण होंगी।
- डिसअर्मामेंट व नियंत्रण पर बहस: उन्नत क्षमताओं के प्रसार से वैश्विक और क्षेत्रीय arms-control वार्ताओं पर दबाव बढ़ सकता है; पारदर्शिता और संवाद की आवश्यकता बढ़ेगी।
नैतिक, नीति और कूटनीतिक सवाल
प्रौद्योगिकी-सफलता के साथ कुछ बड़े सवाल भी उठते हैं — क्या यह क्षेत्रीय शस्त्रीकरण दौड़ में तेज़ी ला सकता है? क्या संतुलन-नीति और संयम को बनाए रखने हेतु नई पारदर्शिता एवं भरोसेमंद-मेकैनिज्म की आवश्यकता नहीं होगी? विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि रक्षा-तकनीक के नागरिक-वितरण और सुरक्षा-मानकों पर भी ध्यान देना होगा ताकि निगरानी, त्रुटि-रोकथाम और दुर्घटना-रोधक उपाय प्रभावी रहें।
प्रौद्योगिकी का सकारात्मक पक्ष
एमआईआरवी जैसी उन्नत क्षमताएँ केवल आक्रमक शक्ति के रूप में ही नहीं देखी जानी चाहिए—इनका विकास रॉकेट-वर्ग प्रणालियों, सटीक मार्गदर्शन, थर्मल-प्रोटेक्शन और स्वदेशी सामग्री-विद्या में भी उन्नति का संकेत है, जो उपग्रह प्रक्षेपण, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और रक्षा-उद्योग के अन्य क्षेत्रों में सहायक हो सकती हैं।
क्या आगे क्या सम्भावित है?
परीक्षण के बाद अगले चरणों में सत्यापन-चक्र, परिचालन तैनाती नीति, लॉजिस्टिक्स और कॅरीअर-डिस्पोज़ल जैसे तकनीकी व नीतिगत मुद्दे सामने आयेंगे। साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पारदर्शिता, संघर्ष-निवारण संचार और द्विपक्षीय/बहुपक्षीय सुरक्षा वार्ताओं की भूमिका अहम रहेगी।


















































