Election Commission: नई दिल्ली, नेशनल मीडिया सेंटर। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में बिना नाम लिए विपक्षी दावों पर सख्त रुख दिखाते हुए कहा कि “PPT में दिखाया गया डेटा हमारा नहीं” और “वोटरों को फर्जी कहना गलत” है। आयोग ने 7 दिन में शपथपत्र देकर सबूत प्रस्तुत करने या देश से माफी मांगने की खुली चुनौती दी।(Election Commission) CEC ज्ञानेश कुमार… “हमारे लिए न कोई पक्ष है, न विपक्ष; सभी दल बराबर हैं। बेबुनियाद आरोप लोकतंत्र का अपमान हैं।”
पलटवार के 5 प्रमुख बिंदु
- डेटा पर असहमति: आयोग ने कहा—प्रेजेंटेशन में दिखाया गया डेटा इलेक्शन कमिशन का नहीं।
- 7 दिन की डेडलाइन: आरोपकर्ताओं से कहा…शपथपत्र में प्रमाण दें या सार्वजनिक माफी मांगें।
- वोटर-शेमिंग पर आपत्ति: “मतदाताओं को ‘फर्जी’ बताना जन-विश्वास को चोट है।”
- निर्भीक निष्पक्षता: “आयोग गरीब-अमीर, महिला-पुरुष, युवा-बुजुर्ग, सभी मतदाताओं के साथ चट्टान की तरह खड़ा है।”
- कानूनी पृष्ठभूमि: SIR (विशेष संक्षिप्त पुनरीक्षण) को लोक प्रतिनिधित्व कानून के तहत चुनाव से पहले मतदाता-सूची दुरुस्ती की अनिवार्य प्रक्रिया बताया।
“वोट चोरी” आरोप से शुरू हुई बहस
7 अगस्त को विपक्षी नेता ने 1 घंटे 11 मिनट का 22 पेज का प्रेजेंटेशन देकर कर्नाटक वोटर लिस्ट का हवाला देते हुए “संदिग्ध वोटरों” का दावा किया और महाराष्ट्र नतीजों के बाद “चोरी” की आशंका जताई थी। EC ने इसे राजनीतिक व्याख्या बताया और प्रमाण की मांग की। CEC: “कुछ मतदाताओं ने ‘वोट चोरी’ का आरोप लगाया; सबूत मांगने पर जवाब नहीं मिला। आयोग ऐसे आरोपों से नहीं डरता।”
SIR पर आयोग की सफाई: “हड़बड़ी नहीं, समयबद्ध दुरुस्ती”
- टाइमलाइन: प्रक्रिया 24 जून से शुरू होकर लगभग 20 जुलाई तक पूरी—“बिहार के 7+ करोड़ मतदाताओं तक पहुंच” वाले सवालों पर स्पष्टिकरण।
- इतिहास: पिछले 20 वर्षों में कई बार SIR—अब तक देश में 10+ बार हो चुका—मुख्य उद्देश्य मतदाता सूची का शुद्धिकरण।
- राजनीतिक दलों की शिकायतें: बहुदलीय आपत्तियों/आवेदनों के आधार पर SIR की पहल—“गलतियों का समय पर संशोधन जरूरी, बाद में नैरेटिव बनाना ठीक नहीं।”
#WATCH | Delhi: Chief Election Commissioner Gyanesh Kumar says, “Some people are misleading that why the SIR exercise is being carried out in such a hurry? Should the voter list be rectified before or after the elections? The Election Commission is not saying this; the… pic.twitter.com/uLbsJXZT7o
— ANI (@ANI) August 17, 2025
नैरेटिव बनाम संस्थागत प्रक्रिया: EC का संदेश क्या है?
आयोग ने बहस को “डेटा-ड्रिवन प्रमाण बनाम राजनीतिक प्रस्तुति” के फ्रेम में रखते हुए कहा कि मतदाता-सूची सुधार एक कानूनी-प्रशासनिक प्रक्रिया है, न कि राजनीतिक सौदेबाज़ी। “सबूत दो या खंडन करो”—यही आयोग का संक्षिप्त संदेश रहा।
टू-द-पॉइंट: किसे क्या करना है?
- आरोप लगाने वाले पक्ष: 7 दिन के भीतर हलफनामा के साथ प्रमाण जमा करें या सार्वजनिक माफी दें।
- राजनीतिक दल/उम्मीदवार: त्रुटि-निवारण के लिए समय पर आवेदन करें—बाद में “वोट चोरी” नैरेटिव से बचें।
- मतदाता: अपनी प्रविष्टियाँ जांचें/अपडेट करें; SIR के दौरान एप/सेवा केंद्र का उपयोग करें।
‘सबूत-आधारित बहस’ पर जोर, 7 दिन में तस्वीर साफ़?
EC ने स्पष्ट किया कि वह निडर और निष्पक्ष है—और अब गेंद उन लोगों के पाले में है जिन्होंने “वोट चोरी” का आरोप लगाया। अगले 7 दिनों में या तो शपथपत्री सबूत सामने होंगे या सार्वजनिक माफी—यही इस बहस का निर्णायक मोड़ हो सकता है।
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