SMS Hospital News: जयपुर का सवाई मानसिंह (SMS) अस्पताल…जिसे प्रदेश की सबसे बड़ी और भरोसेमंद सरकारी चिकित्सा संस्था के रूप में जाना जाता है—आज किसी बीमारी नहीं, बल्कि एक अजीब और चिंताजनक व्यवस्था के कारण चर्चा में है। यहां मरीजों के हाथ में अब इलाज की उम्मीद से भरी सरकारी जांच पर्ची नहीं, बल्कि रद्दी कागज़ या पुरानी पर्चियों के उल्टे हिस्से थमाए जा रहे हैं। न कोई तय फॉर्म, न अस्पताल की पहचान और न ही कोई आधिकारिक आदेश….बस एक कागज़ और उस पर लिखी जांच।
यह बदलाव न तो प्रशासन ने स्वीकार किया है, न ही मरीजों को इसकी कोई जानकारी दी गई। नतीजा यह है कि अस्पताल की गलियारों में भ्रम, नाराज़गी और सवालों का शोर है। (SMS Hospital News) मरीज पूछ रहे हैं…क्या सरकारी अस्पताल में अब सरकारी व्यवस्था भी खत्म हो चुकी है? और सिस्टम इस सवाल पर खामोश नजर आ रहा है।
क्या है पूरा मामला?
अस्पताल के विभिन्न विभागों में ओपीडी के दौरान डॉक्टर सरकारी प्रिंटेड पर्ची की जगह रद्दी पेपर पर अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे, सीटी-स्कैन, एमआरआई और पैथोलॉजी जांचें लिखते पाए गए। तस्वीरों में साफ दिखता है कि फॉर्मेट, सीरियल नंबर और अस्पताल की मानक पहचान नदारद है। इससे यह आशंका गहराती है कि जांच का ट्रैक, रिकॉर्ड और जवाबदेही कमजोर हो रही है। यह स्थिति किसी अस्थायी समस्या की नहीं, बल्कि सोची-समझी लापरवाही या संरक्षण प्राप्त व्यवस्था की ओर इशारा करती है।
नियमों की अनदेखी?
SMS जैसे संस्थान में मानकीकृत पर्ची सिर्फ कागज़ नहीं, बल्कि ऑडिट, दवा-वितरण, जांच-रिकॉर्ड और बीमा/सरकारी योजनाओं की रीढ़ होती है। ऐसे में रेडी पेपर का इस्तेमाल नियमों की अनदेखी या आपूर्ति/प्रबंधन की विफलता की ओर इशारा करता है। यदि पिंक पर्चियां उपलब्ध नहीं हैं, तो इसका जवाब प्रशासन को देना होगा।
डॉक्टरों की मजबूरी या सिस्टम की नाकामी?
कुछ चिकित्सकों का कहना है कि सरकारी पर्चियों की उपलब्धता समय पर नहीं हो पा रही, इसलिए मजबूरी में रद्दी पेपर का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इस मजबूरी की कीमत मरीज चुकाएगा?
क्या कोई अस्थायी आदेश जारी हुआ है?
मरीजों की जांच और रिकॉर्ड की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? जब तक इन सवालों के जवाब नहीं मिलते, रेद्दी पेपर पर लिखी जांचें सिस्टम की साख को खरोंचती रहेंगी। अब जरूरत है तत्काल जांच, जिम्मेदारों पर कार्रवाई और मरीजों के हित में मानक व्यवस्था की बहाली की—ताकि सरकारी अस्पताल भरोसे का अस्पताल बना रहे।


















































