Jaipur News: जयपुर। पितृपक्ष में किए जाने वाले तर्पण और श्राद्ध कर्म को परंपरा में सर्वोपरि स्थान मिलता है। हालांकि कुछ धारणाएँ हैं कि इस अवधि में खरीददारी या नए कार्य अशुभ होते हैं, लेकिन विद्वानों और ज्योतिषाचार्यों का कहना है कि शास्त्रों में ऐसी मनाही दूर की बात है…. बल्कि यह समय पारिवारिक व (Jaipur News)आर्थिक रुप से सक्रिय रहने का भी संदेश देता है।
श्राद्ध से अर्थव्यवस्था को भी बल
ज्योतिषाचार्य अक्षय शास्त्री ने बताया कि पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ जुड़ी खरीददारी …जैसे आहुति सामग्री, प्रसाद, वस्त्र और भोज्य सामग्री….स्थानीय बाजारों में मांग बढ़ाती है। मंदिरों के प्रबंधन, पुजारियों और हवन-सामग्री विक्रेताओं को इस अवधि में खासा व्यवसाय मिलता है, जिससे रोज़गार और छोटे व्यापारों की आय पर सकारात्मक असर पड़ता है। यही वजह है कि पितृपक्ष को धार्मिक साथ-साथ अर्थशास्त्रीय दृष्टि से भी महत्वपूर्ण समझा जाना चाहिए।
शास्त्रीय स्पष्टता: क्या वर्जित है, क्या उचित?
ज्योतिषाचार्य डॉ. महेन्द्र मिश्रा कहते हैं कि तर्पण, पिंडदान और दान यज्ञतुल्य फल देते हैं और इन कर्मों से पितरों की तृप्ति होती है। उनका स्पष्ट कहना है कि पितृपक्ष में खरीदारी या नए कार्यों पर कोई शास्त्रीय रोक नहीं है। इसी तरह पं. सुरेन्द्र गौड़ बताते हैं कि श्रद्धा से किया गया कोई भी कार्य परिवार व समाज के कल्याण में सहायक होता है।
समाज में व्याप्त भ्रांतियों का पर्दाफाश
कई जगहों पर अभी भी यह धारणा प्रचलित है कि पितृपक्ष में मंदिर जाना, विवाह या बड़े कार्य आरंभ करना अशुभ है। विद्वानों के अनुसार शास्त्रों में आवश्यक जीवन-यापन की वस्तुओं के क्रय पर कोई प्रतिबंध नहीं है; यदि रोज़मर्रा की खरीद बंद कर दी जाए तो पारिवारिक जीवन बाधित हो सकता है।
बाजारों में बढ़ी सक्रियता
जयपुर के स्थानीय व्यापारियों और हवन-सामग्री विक्रेताओं का कहना है कि पितृपक्ष के दिनों में मांग बढ़ जाती है — तेल, घृत, चावल, तिल व समानों की बिक्री में उछाल आता है। इससे छोटे और मध्यम व्यापारों को सहारा मिलता है और मंदिर-आधारित सेवाओं का संचालक वर्ग भी लाभान्वित होता है।
आध्यात्मिक और व्यवहारिक सुझाव
पंडित दिनेश शर्मा और ताराप्रकाश शर्मा सहित अन्य विद्वानों का सुझाव है कि पितृपक्ष को सात्विक जीवनशैली अपनाने का अवसर मानकर बिताना चाहिए…दान, सेवा और पारिवारिक व्रतों के साथ-साथ अनुशासित व्यवहार व ब्रह्मचर्य का पालन लाभदायी होगा। पितृपक्ष के दौरान खरीददारी को अशुभ बताने की धारणा को शास्त्रीय और व्यावहारिक दोनों दृष्टियों से खारिज किया जा सकता है। यह अवधि न केवल पूर्वजों को श्रद्धांजलि का समय है बल्कि आर्थिक रूप से छोटे व्यवसायों को समर्थन देने, परिवारिक आवश्यकताओं को पूरा करने और संस्कृति को जीवित रखने का भी महत्वपूर्ण अवसर है।


















































