Putrada Ekadashi: श्री साकेत पंचांग बूंदी के अनुसार पुत्रदा एकादशी केवल धार्मिक व्रत नहीं है — यह उन दंपत्तियों की आशा और सामाजिक-भावनाओं का भी प्रतीक बन चुकी है जो संतानप्राप्ति की समस्या का सामना कर रहे हैं।
पौष पुत्रदा एकादशी 2025
- व्रत आरम्भ: 30 दिसंबर 2025 सुबह 07:50 बजे से
- व्रत समाप्त: 31 दिसंबर 2025 सुबह 05:00 बजे तक
- व्रत पारण (द्वादशी पर): 1 जनवरी 2026 — शुभ पारण मुहूर्त: 07:07 AM से 09:19 AM
- नोट: पंचांग-आधारित तिथियाँ उदय/अस्त और स्थानीय काल के अनुसार अलग दिख सकती हैं — अंतिम पुष्टि अपने स्थानीय पंचांग/पंडित से अवश्य कर लें।
व्रत का अर्थ और धार्मिक महत्व
ज्योतिषाचार्य अक्षय शास्त्री के अनुसार पौष और सावन माह में आने वाली पुत्रदा एकादशी का मुख्य उद्देश्य संतान-लाभ, संतान की दीर्घायु और पारिवारिक कल्याण के लिए परम आस्था से की जाने वाली पूजा है।
परंपरा के अनुसार जो दंपत्ति इस व्रत को श्रद्धापूर्वक रखते हैं, उन्हें शीघ्र शुभ समाचार और संतान की दीर्घायु प्राप्त होने की कामना स्वीकार मानी जाती है।
व्रत विधि
- स्नान कर शुद्ध वस्त्र धारण करें और सुबह सूर्योदय से पूर्व या व्रत आरम्भ समय पर उपवास आरम्भ करें।
- भगवान विष्णु और देवी लक्ष्मी की संयुक्त पूजा करें — दीप, नैवेद्य और पीले पुष्प चढ़ाएँ।
- “ॐ नमो नारायणाय नमः” का जाप और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने वाले घरों में विशेष प्रभाव बताया जाता है।
- रात भर जागरण या भजन-कीर्तन कर सकते हैं; अगली सुबह द्वादशी पर पारण मुहूर्त में व्रत पारित करें।
संतान प्राप्ति के पारंपरिक उपाय (लोकप्रिय प्रथाएँ)
- विष्णु और लक्ष्मी की आराधना, पीले फूल और हल्दी से तिलक।
- तुलसी के पौधे को जल अर्पित करना — घर में सकारात्मक ऊर्जा और ग्रह-प्रभाव में सुधार के लिए शुभ माना जाता है।
- पीले वस्त्र और केले/चना दान करना — विशेषकर ब्राह्मण या जरूरतमंदों को दान से बरकत मानी जाती है।
- विष्णु सहस्रनाम का पाठ — मानसिक शुद्धि और समर्पण भाव बढ़ाने का मार्ग।
- पति-पत्नी दोनों साथ व्रत करें — सामूहिक व्रत से फल बढ़ने की परंपरा प्रचलित है।
आस्था के साथ विज्ञान भी जरूरी
संतान-समस्या सिर्फ शारीरिक नहीं, भावनात्मक व मनोवैज्ञानिक भी होती है। आज के युग में धार्मिक उपायों के साथ प्राकृतिक चिकित्सा, चिकित्सकीय सलाह (प्रजनन विशेषज्ञ/IVF सलाह) और मानसिक स्वास्थ्य समर्थन बहुत महत्वपूर्ण हैं।
विशेषज्ञों की सलाह यह है कि दंपत्तियाँ धार्मिक व्रत को एक सकारात्मक मानसिक-समर्थन के रूप में लें पर जांच-पड़ताल और चिकित्सकीय मार्गदर्शन को अनदेखा न करें।
व्रत का सामाजिक प्रभाव
“हमने पुत्रदा एकादशी मिलकर रखी और साथ ही डॉक्टर से सलाह ली — यह संयोजन हमने परिवार के लिए आशा और तर्क दोनों दिया।” — एक स्थानीय दम्पत्ति
(व्रत रखने वालों के लिए)
- व्रत से पहले किसी भी दान या पूजा की सूची बनाकर रखें और समय पर पारण के मुहूर्त.confirm करें।
- स्वास्थ्य कारणों से यदि उपवास कठिन हो तो अर्द्ध-उपवास या वैकल्पिक अनुष्ठान अपनाने का विचार करें।
- यदि पति-पत्नी दोनों व्रत कर रहे हों तो पारस्परिक सहमति से पूजा व दान करें और चिकित्सकीय सलाह लेना न भूलें।
- व्रत के दौरान मानसिक शांति बनाए रखने के लिए ध्यान, प्राणायाम और हल्का योग लाभकारी रहेगा।
डिस्क्लेमर:
इस लेख में दी गई जानकारी धार्मिक ग्रंथों, विद्वानों और पंचांग पर आधारित मान्यताओं पर आधारित है और केवल सूचना हेतु दी जा रही है।
किसी भी धार्मिक, चिकित्सकीय या कानूनी निर्णय से पहले संबंधित विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें। प्रकाशक/साइट इस सामग्री के परिणामों के लिए उत्तरदायी नहीं होगा।


















































