Congress dinner controversy: नई दिल्ली। मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर सोमवार को आयोजित ‘डिनर डिप्लोमेसी’ ने राजनीति के गलियारों में बहस छेड़ दी है। कांग्रेस इसे विपक्षी एकता का प्रतीक बता रही है, लेकिन आम जनता के बीच यह सवाल तेज़ी से उठ रहा है—जब देश महंगाई, बेरोजगारी, किसानों की कर्ज़मुक्ति (Congress dinner controversy)और बुनियादी सुविधाओं की कमी से जूझ रहा है, तब नेताओं का यह शाही भोज किसके पैसों से हुआ?
महंगाई से कराहती जनता, लेकिन नेताओं के लिए लग्ज़री डिनर
देश में रोज़मर्रा की ज़रूरतें पूरी करने में लोगों को पसीना आ रहा है। पेट्रोल-डीजल के दाम, रसोई गैस की कीमत और खाद्य पदार्थों के रेट आसमान छू रहे हैं। ऐसे हालात में दिल्ली में आयोजित इस आलीशान डिनर पर लोगों का गुस्सा फूटना लाजमी है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने सवाल किया—क्या यही “जनता के प्रति जिम्मेदारी” है?
राहुल गांधी का ‘वोट चोरी’ प्रेजेंटेशन—जनता का मुद्दा या राजनीति का ड्रामा?
डिनर में राहुल गांधी ने चुनावी धांधली और ‘वोट चोरी’ पर प्रेजेंटेशन दिया। कांग्रेस समर्थक इसे बड़ा कदम बता रहे हैं, लेकिन आलोचकों का कहना है कि यह सिर्फ राजनीतिक स्टंट था। जनता को रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई से राहत चाहिए—क्या इस डिनर में उन मुद्दों पर कोई ठोस समाधान निकला?
— Congress (@INCIndia) August 11, 2025
50 से ज्यादा नेता, लेकिन क्या निकला नतीजा?
इस डिनर में इंडिया गठबंधन के 25 से अधिक दलों के 50 से ज्यादा नेता मौजूद थे, जिनमें सोनिया गांधी, राहुल गांधी, प्रियंका गांधी, जया बच्चन, सुप्रिया सुले, पप्पू यादव और अन्य नेता शामिल थे। लेकिन सवाल यह है कि इतनी बड़ी महफ़िल से देश की जनता को क्या फायदा हुआ? क्या यहां लिए गए फैसले लोगों की जिंदगी बदलेंगे या सिर्फ राजनीतिक बयानबाज़ी का हिस्सा बनेंगे?
टैक्सपेयर्स मनी का इस्तेमाल—पारदर्शिता कहां है?
अगर यह आयोजन निजी था, तो इतनी भव्यता और मेहमाननवाज़ी का खर्च कौन उठा रहा था? और अगर यह सार्वजनिक धन से हुआ, तो क्या सरकार और विपक्ष को यह अधिकार है कि वे जनता के टैक्स के पैसे का इस्तेमाल अपने राजनीतिक नेटवर्किंग और प्रचार के लिए करें? यह सवाल अब जोर पकड़ रहा है और लोग जवाब मांग रहे हैं।
जनता का गुस्सा—”हम भूखे सोएं, नेता भोज करें?”
सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा—”देश में किसान आत्महत्या कर रहे हैं, बेरोजगार नौजवान आत्मदाह कर रहे हैं, और नेता हजारों-लाखों रुपये जनता के टैक्स से खर्च कर शाही भोज कर रहे हैं।” विपक्षी एकता का दावा करने वाले नेताओं को अब बताना होगा कि उनके इस डिनर का आम लोगों के जीवन पर क्या असर पड़ेगा।
क्या यह दिखावे की राजनीति है?
डिनर डिप्लोमेसी भले ही एक रणनीतिक कदम हो, लेकिन जब तक जनता को इसका सीधा फायदा नहीं दिखेगा, तब तक यह जनता की नज़रों में सिर्फ “दिखावे की राजनीति” ही मानी जाएगी। जनता का सवाल साफ है—क्या हमारी गाढ़ी कमाई के टैक्स का इस्तेमाल नेताओं की बैठकों, पार्टियों और भोज के लिए होगा या हमारी जिंदगी सुधारने के लिए?


















































