गृहस्थ धर्म—आध्यात्मिकता की सामाजिक साधना
महाराज ने गृहस्थ धर्म की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि स्वयं ठाकुरजी ने भक्तों को गृहस्थ आश्रम में प्रवेश की आज्ञा दी—“ठाकुरजी भक्त के घर बालक बनकर आए हैं।” यही क्रम आगे सद्गुरुदेव से शिष्यों तक पहुँचा और इसी परंपरा से जयपुर में श्रीसरस निकुंज की स्थापना हुई। यह निवृद्ध निकुंज है, जिसमें प्रवेश उसी को मिलता है जिस पर ठाकुरजी की विशेष कृपा होती है।
पूजन, भजन और भाव-विभोर वातावरण
आरम्भ में अलबेली माधुरी शरण महाराज, आयोजक रामगोपाल सर्राफ, प्रवीण बड़े भैया तथा अन्य भक्तों ने व्यासपीठ का पूजन, माल्यार्पण और तिलक कर स्वागत किया।
कीर्तन-पंक्तियों की मधुर स्वर-लहरियों ने सभा को भाव-विभोर कर दिया—
- “कुंज बिहारी श्री शुकदेव श्याम चरणदास, जय श्री शुकदेव…”
- “जय राधे जय कृष्ण जय वृंदावन”
- “रसिक मुकुट मणि, जय गोपीधन…”
- “राधे राधे रट श्याम, राधे राधे श्याम श्याम…”
- “राधा कृष्ण युगल नाम मेरो है जीवन…”
आयोजन स्थल पर श्रीनाथजी सहित शुक संप्रदाय के आचार्यों की झांकी आकर्षण का केंद्र रही। विभिन्न पीठों-मंदिरों के पीठाधीश्वर, संत-महंत भी कथा श्रवण हेतु उपस्थित रहे।

जुगल माधुरी जी की 137वीं जयंती को शब्दांजलि
इस अवसर पर शुक संप्रदाय के आचार्य जुगल माधुरी जी को काव्य-श्रद्धांजलि अर्पित की गई—वे ग़ज़ल-शैली में ठाकुरजी के गुणों का गायन करने के लिए विख्यात रहे हैं, जिसे आज की पीढ़ी तक पहुंचाने का संकल्प भी व्यक्त हुआ।
कार्यक्रम-समय और व्यवस्था
प्रवीण बड़े भैया के अनुसार, भक्तमाल कथा 25 अगस्त तक प्रतिदिन अपराह्न 4:00 से सायं 7:30 बजे तक आयोजित होगी। भक्तों के लिए दर्शन-श्रवण और प्रविष्टि संबंधी आवश्यक व्यवस्थाएँ स्थल पर उपलब्ध हैं।


















































