Amit Shah : नई दिल्ली। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने संसद में पेश किए गए संविधान के 130वें संशोधन बिल का जमकर बचाव करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्रियों के लिए गंभीर आपराधिक मामलों में 30 दिनों के भीतर गिरफ्तारी के बाद पद से हटने का प्रावधान…लोकतंत्र की साख के लिए आवश्यक है।(Amit Shah ) शाह ने यह भी जोड़कर कहा कि यह प्रस्ताव केवल कानून नहीं, बल्कि सार्वजनिक विश्वास बहाल करने का प्रयास है।
जवाबदेही और लोकतंत्र की पैमाइश
शाह ने कहा कि अगर कोई चुनी हुई सरकार जेल से संचालित हो, तो उससे लोकतंत्र की गरिमा घटती है। उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि सत्येंद्र जैन चार साल जेल में रहे और उनके विरुद्ध चार्जशीट दायर की गई — परन्तु इस्तीफा नहीं दिया गया। शाह के अनुसार, ऐसे घटनाक्रम से जनता का विश्वास उठता है और पदों के लिए नैतिक मानदंडों की जरूरत स्पष्ट हो जाती है।
कांग्रेस पर कटाक्ष: दोहरे मापदंड का आरोप
गृह मंत्री ने जोर देकर कहा कि कांग्रेस नेताओं ने जब अपनी सरकार में समान परिस्थिति देखी तो जो व्यवहार किया, आज उसी तरीके की राजनीति पर वे चुप्पी साधते हैं। शाह ने मनमोहन सिंह तथा लालू प्रसाद यादव के संदर्भ देकर आरोप लगाया कि विरोध तब नहीं था, बल्कि अब वही राजनीति दोहरे मानकों की नीति पर आधारित है।
मोदी-इंस्ट्रूमेंटलिटी: स्व-प्रतिबद्धता का राजनीतिक संकेत
अमित शाह ने यह भी बताया कि यह संशोधन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्वयं के खिलाफ लागू करने का विकल्प रखा है—जिसे शाह ने लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति एक प्रकार की सार्वजनिक प्रतिबद्धता बताया। शाह ने कहा कि इंदिरा गांधी के 39वें संशोधन के विपरीत यह एक परिभाषित जिम्मेवारी का संकेत है।
30 दिन की जमानत अवधि: अदालतें ही निर्णायक
विपक्ष की आपत्तियों का जवाब देते हुए शाह ने कहा कि जमानत देने का अधिकार सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट का है। यदि किसी पर झूठे आरोप हैं तो अदालत जमानत दे ही देगी; पर वास्तविक भ्रष्टाचार के मामलों में निष्कर्ष कठोर होगा…गिरफ्तारी और इस्तीफा दोनों होंगे, और बाद में जमानत मिलने पर पद पर वापसी संभव होगी।
जेपीसी बहिष्कार और संसदीय प्रक्रिया
जहाँ कई विपक्षी दल जेपीसी (जनहित जांच समिति) की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहे हैं और बहिष्कार कर रहे हैं, शाह ने कहा कि जेपीसी में गवाह और दस्तावेज बुलाकर तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार होती है, और उसके आधार पर कानून में आवश्यक परिवर्तन किए जाते हैं। उन्होंने विपक्ष के बहिष्कार को संसदीय प्रथाओं के विरुद्ध बताया।
विश्लेषण: जवाबदेही की मांग या राजनीतिक रणनीति?
- जवाबदेही का पक्ष: समर्थक कहते हैं—यह संशोधन पारदर्शिता बढ़ाएगा, सत्ता पर नैतिक दबाव पैदा करेगा और जनता का विश्वास बहाल करेगा।
- आलोचनात्मक स्वर: आलोचक कहते हैं—यह राजनीतिक सूट-बूट के हिसाब से लागू हो सकता है; प्रयोग में आस्था और कानूनी प्रक्रियाओं की सीमाओं का ध्यान जरूरी है।
- न्यायिक भूमिका: अदालतें जमानत/रिहाई के मामलों में निर्णायक रहेंगी — इसलिए विधि और संविधान के दायरे में ही बदलावों का मूल्यांकन होगा।
अगला कदम
अब संसद में इस विधेयक पर बहस, प्रतिपक्षी दलों की प्रतिक्रियाएँ और संभवतः संसदीय समितियों की सुनवाई बनाम जेपीसी, ये तय करेंगे कि यह संशोधन कितनी तेजी से और किस रूप में लागू होगा।
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